ठण्डी ठण्डी हवा चली जब
यादोंं की बारात लगी तब
यादों मे फिर बचपन लौटा
रेत भरी गलियों में लेटा
काले काले बादल आए सज कर
पानी का कटोरा भर कर
कटोरे को उल्टा कर के
जग को पानी से भर के
फिर बारिश में दौड़ा मैं करता छप छप
संग में कागज की नांव मकोडे भर कर
बचपन मेंं ही सच्ची मस्ती होती हैं
एक तरफ माई तो
दूसरी तरफ दोस्तों की टोली होती हैं
टोली के संग निकला नाहने
मर जाऐगी अलाई इसी बहाने
जब खडे़ हुए जोहड़ की ताल पर
जैसे तैरे जलचर के अहसास पर
अब नहीं रही बारिश की वो बूदें
नही मिलती अब वो मस्ती भी ढूढें
अब चारों तरफ बस दिखावा हैं
यह संसार तो बस एक छलावा है
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