वो पल जो उसके पास गुज़रे थे
उन पलों की यादें रोज़ ताज़ा होती हैं
ज़ख्मों को भी ताज़ा कर जाती हैं
कभी रंक तो कभी राजा के जाती हैं
दीवाना था उसकी खताओं की
वो खुशबू थी इन हवाओं की
वो मंज़िल थी सभी दिशाओं की
मुस्कान थी वो इन फिज़ाओं की
Harikesh Yadav BHU
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।