तेरे होठ हैं मदिरा
इनको पीना चाहूं!
तेरी आंखें हैं साहित्य का सागर
इनको पढ़ना चाहूं!
तेरे मस्तक हैं कोरे कागज़
इन पर अपने इश्क़ का इतिहास लिखना चाहूं!
तेरे कपोल हैं कली से कोमल
इनको मैं छूना चाहूं!
तेरी बाहें हैं फूलों का बिस्तर
इनमें मैं सोना चाहूं!
तेरी चाल है सागर की लहरें
इनको मैं चलना चाहूं!
तेरा जीवन है कितना आकर्षक
इसको मैं जीना चाहूं!
तेरी जुल्फें हैं काली रातें
इनमें मैं खोना चाहूं!
तेरा हृदय है कितना नाज़ुक
इसमें मैं बसना चाहूं!
तेरी चाहतें है कितनी पावन
इनको मैं पाना चाहूं!
हरिकेश यादव
काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी
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