शिव से संचालित
हूं मैं भी ,
नहीं कहीं कोई
गड़बड़झाला
कर्मठता के हवन
कुंड से
मिला नहीं मुझे
अमृतवाला
मुझे थमा दो
विष का प्याला!
उससे, तुम से
खुद से
लड़ता रहा हूं
तम से
सदियों से
जीवन के उजास
में
क्या-क्या
मैं कर डाला
मुझे थमा दो
विष का प्याला!
मानवता के उपवन
से कुछ फूल
झड़ गए होंगे
खिलने से पहले
ही बेमौत
मर गए होंगे
मिटी नहीं है
अब तक
उनके क्षुधा
की ज्वाला
मुझे थमा दो
विष का प्याला !
भौतिक चीजे
नहीं तुम्हारी
तिनके की करते
रखवारी
आना-जाना बारी
बारी
सब के लिए
भी जीना सीखो
क्यों बने इतने
मतवाला?
मुझे थमा दो
विष का
प्याला !
आओ
मानवता का
पुनः नया
निर्माण करे
जन-जन के
मन में फिर
से नव स्फूर्ति
नव प्राण भरे
खुशी से झूमै
फिर मानवता
हर दिल से
छलकै प्रेम की
हाला
मुझे थमा दो
विष का प्याला !
-हंस नाथ यादव