हे घृत-बात, भ्रात के लोचन, जीवन को प्रभावित करती,
वह तीन लोक तन्मय हिन्दू के, जीवन को प्रभावित करती।
वेदांगे भीयूओम करे जो, जीवन से क्यों घृणा करे?
यदि दुनिया हिंसा करती हो, तो हिंसा का क्यों त्याग करे?
यदि करता है मृत्यु से ही प्रेम, तो जीवन से क्यों आस रखे?
जब स्वाभिमान की बात उठी, क्यों फेर लिया तुमने मुखड़ा?
अब सुनो ध्यान धर वीर मेरे, पाताल नहीं यह भूमि है,
यदि इस भूमि पर रहते हो, तो इस भूमि का सम्मान करो!
कायरता का पर्दा तजकर, अब शौर्य का आह्वान करो,
जो शीश झुका दे छल के आगे, मत ऐसा अभिमान करो।
यह कर्मभूमि है वीरों की, पग-पग पर शंख बजाना है,
सोए हुए इस स्वाभिमान को, फिर से आज जगाना है।
आँच न आए इस माटी पर, ऐसा कोई संकल्प धरो,
यदि इस धरती पर जन्म लिया, तो इसका ही उत्थान करो!
रण में जो पीछे हट जाए, वह वंशज नहीं भवानी का,
माटी का कर्ज चुकाना ही, धर्म रहा हर प्रानी का।
रक्त बहे तो बह जाने दो, पर आन न अपनी खोने पाए,
इतिहास गवाही देगा जब, कोई वीर न झुकने पाए।
उठो संभलकर बांधो कटिबंध, निज शक्ति पहचान करो,
अंगारों पर चलकर भी तुम, इस भारत का कल्याण करो!