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GOLDI MISHRA

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक खबर आज फिर सिहाई का रंग लिए आई है,
        
                                                    
                            
कौनसा पहली बार आई है,
कल के अखबार में भी तो थी,
बस बेटी किसी और की थी,
वज़ह एक ही थी,
दहेज़ में चंद सिक्कों की थी,
रानी बेटी राज करेगी,
जिस आंगन की क्यारी था बनना वहां राख बनेगी,
अपने स्वप्न लिए,
आंखे मूंदे हुए,
वो तो चल दी थी समाज के बताए रास्ते पर,
थोड़ा सह लो,
रिश्ता ही है समझता कर लो,
क्यूं निशान सबको है दिखाने,
क्यूं हालातों के तमाशे बनाने,
उसे घुटना सिखा दिया,
चार दिवारी में खुद को बंद करना सिखा दिया,
हमने बेटी को ब्याह तो दिया,
गिनती की सांस है लेनी उसे ये आशीष दिया,
आज हज़ार कल ये संख्या लाखों होगी,
हर पन्ने पर दम तोड़ती नई कहानी होगी,
समाज विचारों की पोथियों को बांछता रहेगा,
आदमी को हक है औरत को तोड़ने का ये बार बार दोहराता रहेगा,
चंद सिक्कों की खातिर लाखों अनसुनी बातों को दबाता रहेगा,
अखबार पुराना हो जाएगा,
किस्सा नया हर रोज आता रहेगा,
वो जो सांसे मौन हो गई उनका हिसाब कोई न करेगा,
दहेज में सिक्कों का ब्याज बस चढ़ता रहेगा,
– गोल्डी मिश्रा
10 घंटे पहले
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