विज्ञापन

रे मनवा तू प्रबल प्रतापी बन।।

Gaurav Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            *रे मनवा तू प्रबल प्रतापी बन, अंतर मन की गहन साधना का पुण्य प्रतापी बन।।*
        
                                                    
                            

रे मनवा तू प्रबल प्रतापी बन,
कायरता छोड़, स्वयं का भाग्य विधाता बन।

भटक रहा क्यों द्वार-द्वार तू,
अपने भीतर झाँक, खुद को पहचान तू।

अंतर मन की गहन साधना का पुण्य प्रतापी बन,
मोह-माया छोड़, सत्य का अनुगामी बन।

जब-जब मन डोले, तू अडिग रहा है,
*इस अंतर्मन में गौरव का दीप जला है।*

तू ही शिव है, तू ही शक्ति है,
तुझमें ही छिपी, सृष्टि की भक्ति है।

कष्टों से मत डर, ये तो परीक्षा है,
इनको जीतकर ही, जीवन की समीक्षा है।

क्रोध को त्याग, प्रेम का सागर बन,
रे मनवा तू प्रबल प्रतापी बन।

ध्यान लगा, खुद को जान ले,
इस माया नगरी को तू पहचान ले।

*गौरव कहे, मन को जीत ले प्यारे,*
*फिर देख - सारा जहाँ जीतेगा तू सारे।*

अंतर मन की गहन साधना का पुण्य प्रतापी बन,
रे मनवा तू प्रबल प्रतापी बन।।
 - गौरव कुमार तिवारी
2 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

RATAN KUMAR

787 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10797 कविताएं

View Profile

Ejaz Ahamad

122 कविताएं

View Profile