ख्वाहिशें पूरी करने में,
ज़िन्दगी भर, भटकता रहा ।
ऐ माटी के इंसान ! बता,
आखिर में तू क्या ले के चला ?
मोह की इन गलियों में तूने,
खुशियां गंवाई और सपने तोड़े ।
इस "मैं" बनने के चक्कर में,
ना जाने कितने अपने छोड़े ।
मशगूल अपनी ज़िद में रहा और,
रिश्तों का तूने फन कुचला ।
ऐ माटी के इंसान ! बता,
आखिर में तू क्या ले के चला ?
जो भी समेटा, अब तक तूने,
असल में वो, सब पराए का था ।
जिसको अपना, समझता रहा,
देख ! मकां वो किराए का था ।
जितनी भी सोहरत, कमाई यहां,
इक पल में हो गया, सब धुंधला ।
ऐ माटी के इंसान ! बता,
आखिर में तू क्या ले के चला ?
गली-गली, मारा फिरा,
बेशकीमती खुशियां छोड़कर ।
क्या सोचा था ? समंदर बनाएगा,
इतनी सारी नदियां मोड़कर ।
कोई घमंड में, इतना चूर हो,
अपनों को तोड़, जाता है भला ।
ऐ माटी के इंसान ! बता,
आखिर में तू क्या ले के चला ?
ख्वाहिशें पूरी करने में,
ज़िन्दगी भर, भटकता रहा ।
ऐ माटी के इंसान ! बता,
आखिर में तू क्या ले के चला ?
-डी के तिवारी