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आखिर में तू क्या ले के चला ?

Durgesh Tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ‎ख्वाहिशें पूरी करने में,
        
                                                    
                            
‎ज़िन्दगी भर, भटकता रहा ।
‎ऐ माटी के इंसान ! बता,
‎आखिर में तू क्या ले के चला ?
‎
‎मोह की इन गलियों में तूने,
‎खुशियां गंवाई और सपने तोड़े ।
‎इस "मैं" बनने के चक्कर में,
‎ना जाने कितने अपने छोड़े ।
‎मशगूल अपनी ज़िद में रहा और,
‎रिश्तों का तूने फन कुचला ।
‎ऐ माटी के इंसान ! बता,
‎आखिर में तू क्या ले के चला ?
‎
‎जो भी समेटा, अब तक तूने,
‎असल में वो, सब पराए का था ।
‎जिसको अपना, समझता रहा,
‎देख ! मकां वो किराए का था ।
‎जितनी भी सोहरत, कमाई यहां,
‎इक पल में हो गया, सब धुंधला ।
‎ऐ माटी के इंसान ! बता,
‎आखिर में तू क्या ले के चला ?
‎
‎गली-गली, मारा फिरा,
‎बेशकीमती खुशियां छोड़कर ।
‎क्या सोचा था ? समंदर बनाएगा,
‎इतनी सारी नदियां मोड़कर ।
‎कोई घमंड में, इतना चूर हो,
‎अपनों को तोड़, जाता है भला ।
‎ऐ माटी के इंसान ! बता,
‎आखिर में तू क्या ले के चला ?
‎
‎ख्वाहिशें पूरी करने में,
‎ज़िन्दगी भर, भटकता रहा ।
‎ऐ माटी के इंसान ! बता,
‎आखिर में तू क्या ले के चला ?
‎
-‎डी के तिवारी 
4 घंटे पहले
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