आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आखिर में तू क्या ले के चला ?

                
                                                         
                            ‎ख्वाहिशें पूरी करने में,
                                                                 
                            
‎ज़िन्दगी भर, भटकता रहा ।
‎ऐ माटी के इंसान ! बता,
‎आखिर में तू क्या ले के चला ?
‎
‎मोह की इन गलियों में तूने,
‎खुशियां गंवाई और सपने तोड़े ।
‎इस "मैं" बनने के चक्कर में,
‎ना जाने कितने अपने छोड़े ।
‎मशगूल अपनी ज़िद में रहा और,
‎रिश्तों का तूने फन कुचला ।
‎ऐ माटी के इंसान ! बता,
‎आखिर में तू क्या ले के चला ?
‎
‎जो भी समेटा, अब तक तूने,
‎असल में वो, सब पराए का था ।
‎जिसको अपना, समझता रहा,
‎देख ! मकां वो किराए का था ।
‎जितनी भी सोहरत, कमाई यहां,
‎इक पल में हो गया, सब धुंधला ।
‎ऐ माटी के इंसान ! बता,
‎आखिर में तू क्या ले के चला ?
‎
‎गली-गली, मारा फिरा,
‎बेशकीमती खुशियां छोड़कर ।
‎क्या सोचा था ? समंदर बनाएगा,
‎इतनी सारी नदियां मोड़कर ।
‎कोई घमंड में, इतना चूर हो,
‎अपनों को तोड़, जाता है भला ।
‎ऐ माटी के इंसान ! बता,
‎आखिर में तू क्या ले के चला ?
‎
‎ख्वाहिशें पूरी करने में,
‎ज़िन्दगी भर, भटकता रहा ।
‎ऐ माटी के इंसान ! बता,
‎आखिर में तू क्या ले के चला ?
‎
-‎डी के तिवारी 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर