हारा नहीं, बस ! थोड़ा सा थका हुआ हूँ,
कुछ मजबूरियों से झुका हुआ हूँ ।
लड़ते लड़ते, इतना मग्न हो गया,
खुद, मंजिल अपनी भूला हुआ हूँ,
हारा नहीं, बस ! थोड़ा सा थका हुआ हूँ ।
जा रहा हूँ, खुद को खोजने,
मैं वापस "लड़ने" आऊँगा,
डरा नहीं, बस ! है घाव की सिहरन,
मैं वापस "लिखने" आऊँगा ।
जंग पकड़ीं जंजीरें भी तो,
साहस कभी न खोतीं हैं,
फिर मैं कैसे ! मुझे पता है,
भोरें खतम न होतीं हैं ।
ठोकर लगी है, बस ! लड़खड़ाया हुआ हूँ,
ज़माने ने समझा ! मैं गिरा हुआ हूँ ।
हारा नहीं, बस ! थोड़ा सा थका हुआ हूँ ।