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हारा नहीं, बस ! थोड़ा सा थका हुआ हूँ,

                
                                                         
                            हारा नहीं, बस ! थोड़ा सा थका हुआ हूँ,
                                                                 
                            
‎कुछ मजबूरियों से झुका हुआ हूँ ।
‎लड़ते लड़ते, इतना मग्न हो गया,
‎खुद, मंजिल अपनी भूला हुआ हूँ,
‎हारा नहीं, बस ! थोड़ा सा थका हुआ हूँ ।

‎जा रहा हूँ, खुद को खोजने,
‎मैं वापस "लड़ने" आऊँगा,
‎डरा नहीं, बस ! है घाव की सिहरन,
‎मैं वापस "लिखने" आऊँगा ।
‎जंग पकड़ीं जंजीरें भी तो,
‎साहस कभी न खोतीं हैं,
‎फिर मैं कैसे ! मुझे पता है,
‎भोरें खतम न होतीं हैं ।
‎ठोकर लगी है, बस ! लड़खड़ाया हुआ हूँ,
‎ज़माने ने समझा ! मैं गिरा हुआ हूँ ।
‎हारा नहीं, बस ! थोड़ा सा थका हुआ हूँ ।


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11 घंटे पहले

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