विज्ञापन

जहन का भरम

durga pradhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये दिन कितने जल्दी ढले जा रहें हैं।
        
                                                    
                            
हम यूँ हीं सफर में चले जा रहे हैं ।
लिखा ही नही है कि मंजिल कहां हैं।
पता पुछते हम चले जा रहे हैं।
जमाना है बैठा उम्मीदें लगाए,
मना कर सभी को जिए जा रहे हैं।
लगा था सफर में मिलेगा कोई तो,
जहन का भरम था या दिल को,
तस्सली दिये जा रहें हैं।
चले थे सफर में मुसाफीरों की तरह,
मिला जो सफऱ में संग उसको सफर में,
लिए जा रहें हैं।
2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all