"शांतिकुंज — युग निर्माण की पावन धरा"
गुरुवर की तपमयी साधना का,
यह पावन प्रतीक महान,
शांतिकुंज की पुण्य धरा पर,
गूँज रहा नव युग का गान।
ज्ञान यहाँ है, प्रेम यहाँ है,
विज्ञान यहाँ साकार,
अनुशासन की निर्मल धारा,
करती जीवन का उद्धार।
गायत्री की दिव्य ज्योति ने,
जन-जन में विश्वास जगाया,
मंत्र नहीं केवल उच्चारण,
जीवन जीने का मार्ग बताया।
आचार्य श्रीराम शर्मा जी ने,
युग-निर्माण का दीप जलाया,
“हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा”—
जन-जन को यह मंत्र सुनाया।
पहले अपने मन को जीतें,
फिर जग को संदेश सुनाएँ,
अपने आचरण को निर्मल करके,
दूजों को तब राह दिखाएँ।
माता भगवती देवी ने,
ममता का अमृत बरसाया,
त्याग, तपस्या, सेवा देकर,
नारी-शक्ति को जगमगाया।
माँ की करुणा, माँ की ममता,
बनकर बनीं संस्कारों की धार,
घर-घर में सद्भाव जगाकर,
दिया प्रेम का अनुपम उपहार।
शांतिकुंज केवल आश्रम नहीं,
यह बन गई जीवन की पाठशाला,
जहाँ स्वयं को बदलने वाला,
पाता जीवन का उजियारा।
यहाँ साधना सेवा बनती,
सेवा बनती सच्चा ज्ञान,
त्याग, तपस्या, प्रेम जहाँ हों,
वहीं सफल होता इंसान।
गुरुवर कहते—पहले बदलो,
अपने जीवन का व्यवहार,
फिर संसार बदलने निकलों,
लेकर सच्चे कर्मों का सार।
वाणी से उपदेश न देना,
पहले कर्मों से समझाना,
गुरु के पथ पर चलकर ही तो,
गुरु का संदेश निभाना।
अपने दोषों को पहले देखें,
फिर दूजे को सीख सिखाएँ,
गुरु के पावन आदर्शों से,
अपने जीवन को महकाएँ।
आओ मिलकर प्रण यह लें हम,
सत्य-सदाचार अपनाएँगे,
गायत्री की ज्योति हृदय में,
हर अंधियारा दूर भगाएँगे।
हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा,
बदलेंगे जीवन के संस्कार,
एक सुधरे, सौ को सुधारे,
फिर सुधरेगा यह संसार।
एक दीप से दीप जलेगा,
एक हृदय से हृदय मिलेगा,
एक कदम जब सत्य बढ़ेगा,
नवयुग का निर्माण खिलेगा।
शांतिकुंज की पावन धरती,
युग-युग तक संदेश सुनाए,
गुरुवर-माता के आदर्शों से,
मानव अपना धर्म निभाए।
नमन गुरुवर को, नमन माताजी,
नमन तपोभूमि महान,
गायत्री की पावन छाया में,
सफल हो मानव का अभियान।
हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा—
यही रहे जीवन का सार,
गुरुवर-माता के सपनों से,
सज उठे सुंदर संसार।
गायत्री की ज्योति जले तो,
मिटे अज्ञान का अंधकार—
शांतिकुंज से उठे पुकार,
बदलें हम, बदले संसार।