"बेटी बचेगी, तभी दुर्गा बचेगी!"
बेटी बचेगी, तभी दुर्गा बचेगी!
बेटी मिटेगी, तो सृष्टि कैसे बचेगी?
मंदिर में माँ की ज्योति तभी जलेगी,
जब घर में बेटी सुरक्षित रहेगी।
पत्थर की मूरत में शक्ति खोजोगे,
जीवित शक्ति को कब तक रोकोगे?
बेटी है सृष्टि, बेटी है शक्ति,
बेटी से ही जीवन की अभिव्यक्ति।
उसके सम्मान से संस्कृति सजेगी,
बेटी बचेगी, तभी दुर्गा बचेगी!
बेटी हँसेगी, तो बगिया खिलेगी,
बेटी पढ़ेगी, तो पीढ़ी सँवरेगी।
बेटी बढ़ेगी, तो दुनिया निखरेगी,
बेटी बचाओ, तो दुर्गा बचेगी!
बेटी का मान ही सच्ची आराधना,
उसकी रक्षा ही धर्म की साधना।
उसके सपनों को आकाश मिलेगा,
तभी देश को नया इतिहास मिलेगा।
हर सूनी बगिया फिर से महकेगी,
हर आँगन में खुशियाँ फिर से चहकेगी।
बेटी है जीवन का सार,
उसके आँचल में पूरा संसार।
जिस घर में बेटी की किलकारी नहीं,
उस घर में खुशियों की फुलवारी नहीं।
जिस आँगन में बेटी का मान नहीं,
उस घर में ईश्वर का सम्मान नहीं।
मंदिर में माँ को चुनरी चढ़ते हो,
पत्थर की मूरत को शीश झुकाते हो।
फिर जीवित देवी का अपमान क्यों?
बेटी के हिस्से में इतना व्यवधान क्यों?
पत्थर की मूरत को शक्ति मानते हो,
जीवित नारी की शक्ति क्यों नहीं पहचानते हो?
जिस नारी से जीवन का विस्तार है,
उसी के सम्मान पर इतना विचार क्यों?
बेटी को पूजने से पहले अपनाना सीखो,
उसके अस्तित्व को दिल से स्वीकारना सीखो।
वरना मंदिरों में आरती तो सजेगी,
पर मानवता की ज्योति कैसे जलेगी।
बेटी बचेगी, तभी सृष्टि बचेगी,
बेटी हँसेगी, तभी संस्कृति सजेगी।
बेटी पढ़ेगी, तो पीढ़ी सँवरेगी,
बेटी बढ़ेगी, तो दुनिया निखरेगी।
बेटी ही नहीं होगी, तो सोचो ज़रा,
किस रूप में माँ दुर्गा तुम्हें मिलेगी?
बेटी बचेगी, तभी दुर्गा बचेगी,
वरना सृष्टि कैसे बचेगी?
-प्रदीप बाबू