प्रकृति अपने आत्म में, अनंत पीढ़ा सह रही,
जिनको देती लाभ वो खुद उन्ही से ढह रही l
नित नित मानव रच रहा , स्वार्थ के चिनार को,
छीन रहा है रंग उसका, निज लोभ रस व्यवहार को l
सह रही निज धैर्य से, लाभ हो परार्थ हो,
मन में कामना यही मानव भी उसके साथ हो।
मां है वह ममता करें तुम बालक अपना जानकर,
तुम लगाते घात उस पर एक खिलौना मानकर l
वृक्ष काटे काटे पर्वत, नदियां भी देती है दुहाई,
पशु पक्षियों के कलरव अब कहां ही देते है सुनाई l
लेकर उनकी जान मानव, तूने दुनिया है बसाई ,
करके ऐसे विश्वासो का घात, शर्म तुझे काहे ना आई l
न रौंद मेरी आत्मा को, सब्र कर विचार कर ,
मम रोद्रता न छा सके तू ऐसा एक व्यवहार कर l
सृष्टि के रचने वाले की सुंदर कृति मैं भी रही,
तू जान ले यह मान ले यह कृति कभी रुकनी नहीं l
यह कृति कभी रुकनी नहीं l
यह कृति कभी रुकनी नहीं l