विज्ञापन

केवट प्रसंग

Dr. Mamta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वन वन भटक रहे थे राम
        
                                                    
                            
और सीता सुकुमारी।
लक्ष्मण ने भी छोड़ी अवधपुरी
बने भाई सहचारी ।।

त्याग राजमहल के सुख सब
बन गए भगवा धारी ।
केवट हमको पार उतारो
विनती यही हमारी ।।

केवट सुनकर बोले प्रभु जी
न ऐसी बाते कीजो ।
सेवक का शीश धरा चरण में
अपनी सेवा में लीजो ।।

अवसर दीजो हे मेरे भगवन
जो पग लू आज पखार ।
गंगा जल से सींच लू चरणन
फिर उतरो नाव हमार ।।

धन्य हुई ये काठ की नैया
उतरे अवधबिहारी ।
सीता मैया संग बिराजे
लक्ष्मण करते रखवाली ।।

सरयू पार राम सिया यूं बोले
केवट मुदरी रख लो ।
और कुछ अब नही पास में
श्रम का अपने फल लो ।।

भीगी आंखे, गिरे चरण में
केवट संभल न पाए ।
रो रो के ये कहे प्रभु से
कैसी लीला करते हो रघुराई ।।

जीवन का उद्धार हो गया
जो प्रभु ने गले लगाया ।
धन्य हो गई पुश्तें मेरी
प्रभु सेवा का अवसर पाया ।।

मेरे पुरखों की हुई आज
धन्य भाग से मुक्ति ।
इतना भगवन मैं हुआ कृतज्ञ
धन्य हुई ये किश्ती।।

राम राम की रटन लगाए
केवट सुधबुध भूले ।
मां जानकी रहे हर्षाए
लक्ष्मण मन मन फूले।।
2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

kamal jha

90 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10991 कविताएं

View Profile