वन वन भटक रहे थे राम
और सीता सुकुमारी।
लक्ष्मण ने भी छोड़ी अवधपुरी
बने भाई सहचारी ।।
त्याग राजमहल के सुख सब
बन गए भगवा धारी ।
केवट हमको पार उतारो
विनती यही हमारी ।।
केवट सुनकर बोले प्रभु जी
न ऐसी बाते कीजो ।
सेवक का शीश धरा चरण में
अपनी सेवा में लीजो ।।
अवसर दीजो हे मेरे भगवन
जो पग लू आज पखार ।
गंगा जल से सींच लू चरणन
फिर उतरो नाव हमार ।।
धन्य हुई ये काठ की नैया
उतरे अवधबिहारी ।
सीता मैया संग बिराजे
लक्ष्मण करते रखवाली ।।
सरयू पार राम सिया यूं बोले
केवट मुदरी रख लो ।
और कुछ अब नही पास में
श्रम का अपने फल लो ।।
भीगी आंखे, गिरे चरण में
केवट संभल न पाए ।
रो रो के ये कहे प्रभु से
कैसी लीला करते हो रघुराई ।।
जीवन का उद्धार हो गया
जो प्रभु ने गले लगाया ।
धन्य हो गई पुश्तें मेरी
प्रभु सेवा का अवसर पाया ।।
मेरे पुरखों की हुई आज
धन्य भाग से मुक्ति ।
इतना भगवन मैं हुआ कृतज्ञ
धन्य हुई ये किश्ती।।
राम राम की रटन लगाए
केवट सुधबुध भूले ।
मां जानकी रहे हर्षाए
लक्ष्मण मन मन फूले।।
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