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हर सुबह एक युद्ध

Dr. Mamta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            डर की चादर ओढ़े क्यों
        
                                                    
                            
प्रकाश इस मन का छोड़े क्यों ।
हर सुबह नई किरण लाती,
फिर क्यों अतीत से डर खाती

तू कर्म कर बस राह बना
फल क्या होगा न सोच जरा
मेहनत से चट्टान हिला दे
हर मुश्किल को आसान बना दे।

चिंता में भ्रम समाया है,
निज सोच का तार हिलाया है।
साहस से जरा कदम बढ़ा,
जीवन को नया अर्थ दिला।

जो बीत गया, वो सपना था,
जो आने वाला है, अपना है।
वर्तमान को तू पकड़ प्यारे,
नित संघर्षों से लड़ प्यारे।

जीवन है संग्राम बड़ा,
कभी धूप तो कभी छांव पड़ा।
पर तू न डर, तू न झुक,
हर पल को जी, हर दुख और सुख।

चिंता मत कर, प्रयास तो कर,
तू खुद में ही विश्वास तो कर
हारेंगे तो हारेंगे कोई बात नहीं
जीत को हम निहारेंगे कोई बात नहीं
गिर गिर कर भी हम उठ जाएंगे
नए युद्ध को लड़ने फिर रणभूमि आयेंगे
एक वर्ष पहले
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