डर की चादर ओढ़े क्यों
प्रकाश इस मन का छोड़े क्यों ।
हर सुबह नई किरण लाती,
फिर क्यों अतीत से डर खाती
तू कर्म कर बस राह बना
फल क्या होगा न सोच जरा
मेहनत से चट्टान हिला दे
हर मुश्किल को आसान बना दे।
चिंता में भ्रम समाया है,
निज सोच का तार हिलाया है।
साहस से जरा कदम बढ़ा,
जीवन को नया अर्थ दिला।
जो बीत गया, वो सपना था,
जो आने वाला है, अपना है।
वर्तमान को तू पकड़ प्यारे,
नित संघर्षों से लड़ प्यारे।
जीवन है संग्राम बड़ा,
कभी धूप तो कभी छांव पड़ा।
पर तू न डर, तू न झुक,
हर पल को जी, हर दुख और सुख।
चिंता मत कर, प्रयास तो कर,
तू खुद में ही विश्वास तो कर
हारेंगे तो हारेंगे कोई बात नहीं
जीत को हम निहारेंगे कोई बात नहीं
गिर गिर कर भी हम उठ जाएंगे
नए युद्ध को लड़ने फिर रणभूमि आयेंगे