आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हर सुबह एक युद्ध

                
                                                         
                            डर की चादर ओढ़े क्यों
                                                                 
                            
प्रकाश इस मन का छोड़े क्यों ।
हर सुबह नई किरण लाती,
फिर क्यों अतीत से डर खाती

तू कर्म कर बस राह बना
फल क्या होगा न सोच जरा
मेहनत से चट्टान हिला दे
हर मुश्किल को आसान बना दे।

चिंता में भ्रम समाया है,
निज सोच का तार हिलाया है।
साहस से जरा कदम बढ़ा,
जीवन को नया अर्थ दिला।

जो बीत गया, वो सपना था,
जो आने वाला है, अपना है।
वर्तमान को तू पकड़ प्यारे,
नित संघर्षों से लड़ प्यारे।

जीवन है संग्राम बड़ा,
कभी धूप तो कभी छांव पड़ा।
पर तू न डर, तू न झुक,
हर पल को जी, हर दुख और सुख।

चिंता मत कर, प्रयास तो कर,
तू खुद में ही विश्वास तो कर
हारेंगे तो हारेंगे कोई बात नहीं
जीत को हम निहारेंगे कोई बात नहीं
गिर गिर कर भी हम उठ जाएंगे
नए युद्ध को लड़ने फिर रणभूमि आयेंगे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर