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एक बीज

Dr. Mamta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मिट्टी में दबा एक बीज,
        
                                                    
                            
चुपचाप पड़ा, अनजान सा,
न धूप मिली, न हवा मिली,
अंधेरा चारोयाम था

एक दिन मिट्टी ने पूछा,
“तू इतना चुप क्यों रहता है?”
बीज बोला—“मन आज़ादी के,
तानें बुनता रहता है।”

आँधी आई, बारिश आई,
मिट्टी थी उसको दबा रही,
पर बीज ने हार नहीं मानी,
सृष्टि थी उसको बचा रही।

फूटा अंकुर बहुत लघु सा
श्वेत पाती उसे पर आई
मंद मंद वह लगा मुस्काने
अब हरियाली उस पर छाई,

बना वृक्ष पर सेवा हेतु
जीवन उसने लगा दिया
बच्चों सुनो तुम बच्चों खातिर
डाल अपनी को झुका दिया

रोज खेलने आते बच्चे
छाया सुख का एहसास भरी
फल उसके क्या मीठे मीठे
शब्दों से न जाए कही

वह बीज हमें यह सिखलाता है
दबना होता है अंत नहीं
श्रद्धा, हिम्मत, विश्वास,प्रेम है,
सपनों का कोई अंत नहीं

वो बीज हमारे वही वीर थे
आजादी की जंग लड़ी
नमन है उनकी उम्मीदों को
जिनमें आजादी की प्रतिमा बनी

धन्य धन्य है भारत भूमि
धन्य है इसकी बगियारी
आज भी जिसकी रक्षा हेतु
तीनों फौज खड़ी बन के प्रहरी

 
एक महीने पहले
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