कीचड़ का कारण भी जल है,
और निवारण भी जल...
बस, उसके बहने की दिशा बदलनी होती है।
कुछ ऐसा ही तो मन है,
जिसमें जन्म लेते हैं
ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और छल,
और इसी मन में पलती है
प्रेम, करुणा, क्षमा और निर्मलता भी।
मन ही उलझाता है
अपनों को अपनों के विरुद्ध,
मन ही जोड़ता है
टूटे हुए रिश्तों के बिखरे सिरों को।
मन ही बनाता है
किसी की आँखों में नफ़रत का घर,
मन ही किसी अनजान के दुःख में
अपनी आँखें नम कर जाता है।
दोष संसार का नहीं,
हर बार परिस्थितियों का भी नहीं,
कभी ठहरकर अपने भीतर देखना,
कहीं कोई गाँठ
हमने अपने ही मन में तो नहीं बाँध रखी है?
हम उम्र भर तलाशते रहते हैं
दूसरों को बदलने के रास्ते,
पर अपने भीतर झाँकने का
एक पल भी नहीं निकालते।
हम चाहते हैं कि दुनिया निर्मल हो,
हर रिश्ता पवित्र हो,
हर चेहरा सच्चा हो...
पर क्या कभी अपने मन से पूछा है—
जो शुद्धता हम दूसरों में खोजते हैं,
क्या उसका एक अंश भी
हमने अपने भीतर उतारा है?
याद रखना,
मन में उठने वाला हर विचार
हमारे व्यक्तित्व की मिट्टी गूँथता है,
हर भावना हमारे व्यवहार में ढलती है,
और हर व्यवहार
हमारे जीवन की कहानी लिखता है।
इसलिए मन को मारना नहीं,
मन को समझना सीखो;
विचारों से लड़ना नहीं,
उन्हें सही दिशा देना सीखो।
जल को बहने दो,
तो कीचड़ बह जाता है;
मन में करुणा जगा दो,
तो द्वेष पिघलने लगता है।
मन में क्षमा उतार दो,
तो वर्षों का बोझ हल्का हो जाता है;
मन में प्रेम जगा दो,
तो पत्थर-सा हृदय भी
एक दिन फूल बन जाता है।
क्योंकि पवित्रता
बाहर से ओढ़ी हुई कोई चादर नहीं,
यह भीतर जागा हुआ वह प्रकाश है,
जिसमें अपने दोष भी दिखाई देते हैं
और उन्हें बदलने का साहस भी मिलता है।
इसलिए मन से हारना मत,
मन को सँवारना सीखो;
जिस मन ने तुम्हें भटकाया है,
उसी मन में लौटकर
अपना रास्ता बनाना सीखो।
कीचड़ भी जल से,
निर्मलता भी जल से;
विकार भी मन से,
मुक्ति भी मन से...
बस, इतना-सा अंतर है—
एक दिशा हमें गिराती है,
दूसरी दिशा हमें उठाती है।
मन को दोष देकर क्या पाओगे,
जब परिवर्तन की चाबी
उसी मन के पास है;
जिस दिन भीतर की दिशा बदल गई,
उस दिन जीवन बदलने का
पहला अध्याय लिख जाएगा।
-अखिलेश श्रीवास्तव*