ऐ दिल बता तुझे ये क्या हो गया है
क्यूँ इश्क़ की आंधी में तू तबाह हो गया है।
छुप छुप के रो रहा है , ग़ुम सुम सा हो गया
क्या तेरा किसी तन्हाई से निकाह हो गया है।
किसने कुचल के रख्खा है तेरी खियाबां को
कौन है वो कातिल जिससे गुनाह हो गया है।
किसके कफ़स में फंसा तू क्यूँ देता फुंगा है
तू किस बेवफा के इश्क़ में गुमराह हो गया है।
लूट ली गयी इब्तिसाम तेरी तुझे दे दी गयी उक़ूबत
कुछ रह गया है बाकी या आसुदाह हो गया ।
क्या हूर थी वो कोई कि परी फलक से आई
"दिवाकर "जो प्यार उससे तुझे बेपनाह हो गया है।
- दिवाकर बुडाकोटी
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।