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क्या मैंने माँगा था

Divya Kesarwani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्या मैंने माँगा था
        
                                                    
                            
कुछ खुशियां अपने दिल के लिए
बस कुछ पल अपने साथ बिताने
कुछ क्षण अपने जीवन के लिए
जब तुम्हे चुना जीवनसाथी
सोचा था साथ निभाएंगे
कुछ तुम करना अपने मन की
कुछ हम अपनी मनवाएंगे
सब कुछ तो ठीक ही लगता है
ऊपर से और बाहर से यहां
फिर क्यों दिल में अनबन सी है
उलझन है तुम्हे समझ न पाने की

क्या मैंने माँगा था
तुमसे धन दौलत या महल कोई
बस थोड़ी इज़्ज़त मान जरा
विचारों का सम्मान जरा
तुम सिर्फ रह गए एक पुरुष
इस पुरुष प्रधान मोहल्ले में
ऊपर से दिखावा करते हो
मैं साथ निभाता ब्याहता का
बस बड़ी बड़ी बातें करके कोई
मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं बन जाता
तुम कलियुग के ही राम हो
जिसके अंदर रावण है बसता
क्या मैंने माँगा था
अब कुछ शेष नहीं है बचा यहां
बस एक सूत के धागे सा
मजबूरी कहूं या कहूं बेड़ी
रिश्ता ये निभाए जाती हूँ
- दिव्या
3 वर्ष पहले
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