खुशियों के संग बीच सफ़र में पत्नी का खो जाना
कितनी पीड़ा देता है पुरुषों का एकाकी रह जाना.
बन निर्झर ना बह पाता दुःख पुरुषों के अंतस का
निर्जन वन में शुष्क ठूंठ सा कितना मुश्किल रह जाना.
भीड़ भरी बाजारों में और मेला पनघट चौबारो में
सब कुछ होता साथ हमारे ,छोड़ के प्यारे हाथों को
सारे सुख पर भारी पड़ता दुःख ना उसके होने का
सब कुछ लाती याद तुम्हारी बिन तेरे मुश्किल रह पाना.
-दिनेश चौहान