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रातों दिन दौड़े बहुत मिला ना मन को धीर

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नदिया प्यासी रह गई बह गया सारा नीर
        
                                                    
                            
घाट घाट पर सब जुटे शहर के सारे वीर.

घर जिनके सब बह गये कौन धराये धीर
पांव विवाईं ना फटी क्या जाने वो पीर.

रातों दिन दौड़े बहुत मिला ना मन को धीर
लहरें बढ़ती ही रहीं. गईं हृदय को चीर.

दो बांके चलते रहे इत उत चारों ओर
प्रतिपल परलय सा दिखा पानी का ना छोर.

कंटक बोकर चाहते चुभे ना पग में शूल
गन्ध सुगंध पराग संग उपजे कैसे फूल.
-दिनेश चौहान
3 घंटे पहले
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