नदिया प्यासी रह गई बह गया सारा नीर
घाट घाट पर सब जुटे शहर के सारे वीर.
घर जिनके सब बह गये कौन धराये धीर
पांव विवाईं ना फटी क्या जाने वो पीर.
रातों दिन दौड़े बहुत मिला ना मन को धीर
लहरें बढ़ती ही रहीं. गईं हृदय को चीर.
दो बांके चलते रहे इत उत चारों ओर
प्रतिपल परलय सा दिखा पानी का ना छोर.
कंटक बोकर चाहते चुभे ना पग में शूल
गन्ध सुगंध पराग संग उपजे कैसे फूल.
-दिनेश चौहान
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