भूख का कोई धर्म नहीं होता
फिर धर्म क्यों भूखा रहता है.
रोटियां हरेक को ही चाहिए
ये मर्म क्यों सूखा रहता है .
इबारतें पेट भर पायेंगी क्या
विधान बस धोखा रहता है .
इमारतें कंक्रीट की हैं बहुत
आदमी क्यों भूखा रहता है.
लोकतंत्र जिन्दा रावण है
राम का तो झोंका रहता है.
चढ़े जो सलीब पर दिखते
कागज का खोखा रहता है.
-दिनेश चौहान