अभिशप्त शिलाएं लाखों जब
एक राम अकेले कैसे तारें सब.
आँचल हर वक्ष से मुक्त हुआ
हर हृदय प्रेम से रिक्त हुआ .
चाँद से चेहरे सब बिगड़ गये
लालच फरेब से जकड़ गये.
हर भरत ने सत्ता अब हथियाई
मिलता नहीं लक्ष्मण सा भाई.
हर व्यक्ति काफिले में चलता
पर मन किसी से नहीं मिलता.
हरी भरी हर बगिया के बाहर
पहरे पर दिखता एक अजगर.
अन्दर दानव बाहर भी दानव
नाटक धर्मों का देगा कब मानव .
-दिनेश चौहान