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अभिशप्त शिलाएं लाखों जब

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अभिशप्त शिलाएं लाखों जब
        
                                                    
                            
एक राम अकेले कैसे तारें सब.
आँचल हर वक्ष से मुक्त हुआ
हर हृदय प्रेम से रिक्त हुआ .
चाँद से चेहरे सब बिगड़ गये
लालच फरेब से जकड़ गये.
हर भरत ने सत्ता अब हथियाई
मिलता नहीं लक्ष्मण सा भाई.
हर व्यक्ति काफिले में चलता
पर मन किसी से नहीं मिलता.
हरी भरी हर बगिया के बाहर
पहरे पर दिखता एक अजगर.
अन्दर दानव बाहर भी दानव
नाटक धर्मों का देगा कब मानव .
-दिनेश चौहान
2 घंटे पहले
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