आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अभिशप्त शिलाएं लाखों जब

                
                                                         
                            अभिशप्त शिलाएं लाखों जब
                                                                 
                            
एक राम अकेले कैसे तारें सब.
आँचल हर वक्ष से मुक्त हुआ
हर हृदय प्रेम से रिक्त हुआ .
चाँद से चेहरे सब बिगड़ गये
लालच फरेब से जकड़ गये.
हर भरत ने सत्ता अब हथियाई
मिलता नहीं लक्ष्मण सा भाई.
हर व्यक्ति काफिले में चलता
पर मन किसी से नहीं मिलता.
हरी भरी हर बगिया के बाहर
पहरे पर दिखता एक अजगर.
अन्दर दानव बाहर भी दानव
नाटक धर्मों का देगा कब मानव .
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
46 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर