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मैंने सोचा कि मंजिल तुम्ही हो मेरी...

DILIP TRIPATHI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहर दो पहर , हर  पहर  में रहा।
        
                                                    
                            
हमेशा तेरा ही  चेहरा नजर में रहा ।।
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बात तेरी रही  ख्याल  तेरा  रहा ।
तेरा तसव्वुर ही शामों-सहर में रहा ।।
,
मैंने सोचा की मंजिल तुम्ही हो मेरी ।
दिल है मेरा की मैं बस सफर में रहा।।
,
हादसे हादसे हादसे हादसे ।
दिल इन्ही हादसों के असर में रहा ।।
,
दिल की शामें मुक़म्मल कभी ना हुई ।
जलती यादों की ये दोपहर में रहा ।।
,
खुशनसीबी में उसकी थी उम्रे कटी ।
कई परिंदो का घर उस शजर में रहा ।।
,
मैं ना मुझमे रहा , मैं ना तुझमे रहा ।
ना महलों में ना ही मैं घर मे रहा ।।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले
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