धर्म नहीं है केवल वंदन,
धर्म नहीं है माथे का चंदन।
धर्म नहीं है मंदिर-मस्जिद,
न यह कोई व्यर्थ का बंधन।
धर्म तो है इक बहती धारा,
जिसने भटके मन को संवारा।
भूखे को जो भोजन दे दे,
वही धर्म है सबसे न्यारा।
मज़हब की दीवारों को तोड़ो,
मानव की पीड़ा को जोड़ो।
सत्य बोलना, प्रेम निभाना,
गिरते हुए को गले लगाना।
भेदभाव के सारे तम को,
करुणा के दीपक से मिटाना।
कण-कण में जो देख सके ईश्वर,
वही यहाँ है सच्चा ज्ञानी ।
रंग-रूप और जाति से ऊपर,
सबसे बड़ा धर्म इंसानी ।
न नारों में, न वादों में,
न केवल शंखनादों में।
धर्म तो मौन रहकर भी,
दिखता है नेक इरादों में।
जो गिरते को उठा पाए,
जो रोते को हँसा पाए।
वही है धार्मिक सच्चा,
जो इंसानियत को बचा पाए।
गीता, कुरान और बाइबल की शिक्षा,
तभी तो सफल हो पाएंगी।
जब स्वार्थ की इन दीवारों को,
मन की करुणा ढहा पाएंगी।
तपस्या केवल वन में नहीं,
जीवन के संघर्षों में है।
ईश्वर की सच्ची भक्ति तो,
औरों के सुख और हर्षों में है।
मत बांटो इंसानों को तुम,
मज़हब के इन बाज़ारों में।
सच्चा धर्म तो बहता है,
बस निश्छल प्रेम की धारों में।
-देवेंद्र मणि पाण्डेय