मुझे कड़वे सच से परहेज नहीं,
बस झूठी मिठास नहीं चाहिए।
मुझे बड़ी-बड़ी बातें नहीं,
छोटी-छोटी पूरी होती उम्मीदें चाहिए।
एक ऐसी सुबह चाहिए,
जहाँ चाय के साथ अखबार में
कोई अच्छी खबर हो,
लड़ाई नहीं, हँसी हो।
जहाँ सपने सिर्फ देखे न जाएं,
बुने भी जाएं,
और पूरे भी हों —
जहाँ गाँव का लड़का भी
खेत से लैब तक सोच सके,
जहाँ बेटी सिर्फ पढ़े नहीं,
उड़े भी — खुला आसमान छुए भी।
जहाँ बुजुर्गों को दवाई के लिए
शहर न भागना पड़े,
जहाँ मेहनत करने वाले के हाथ में
काम हो, सम्मान हो।
जहाँ सड़क सिर्फ सड़क न हो,
सपनों तक जाने का रास्ता हो,
खेत सिर्फ खेत न हो,
भविष्य की प्रयोगशाला हो।
मैं मीठा बोलना चाहता हूँ,
मैं मीठा जीना चाहता हूँ,
सबके साथ, सबके लिए,
पर मुँह में राम बगल में छुरी नहीं चाहिए।
मुझे दिखावे की मुस्कान नहीं,
मेहनत का पसीना चाहिए,
मुझे शोर नहीं,
सुकून चाहिए,
मुझे भीड़ नहीं,
अपने लोग चाहिए।
और हाँ...
जहाँ काबिलियत अस्थायी न हो,
जहाँ मेहनत का फल किस्तों में न हो,
जहाँ हर साल इम्तिहान न देना पड़े,
जहाँ हौसला हर अनुबंध पर कांपे नहीं।
इसलिए आज कहता हूँ, दिल से कहता हूँ —
नफरत नहीं, मोहब्बत चाहिए!
भटकाव नहीं, पढ़ाई चाहिए!
पलायन नहीं, कमाई चाहिए!
बहाना नहीं, दवाई चाहिए!
हमें लड़ाई नहीं, पढ़ाई चाहिए!
हमें बुराई नहीं, भलाई चाहिए!
हमें बस, एक मीठा भविष्य चाहिए!
-देवकी नन्दन