तुम से मिलते थे वो ज़माना था,
ख़्वाब इन आँखों में सजाना था।
बस एक दीदार की हसरत लिये
तुम्हारे कूचे से आना जाना था।
रौनक-ओ-रानाई निखर जाती थी,
दिलकश तुम्हारा मुस्कुराना था।
हुए रुसवा तुम्हारी उल्फ़त में हम,
हर ज़ुबाँ पे हमारा फ़साना था।
रह-ए-उल्फ़त पे थोड़ी दूर साथ चले,
आगे एक मोड़ पर मुड़ जाना था।
"शमीम" कौन साथ देता है ता-उम्र, ,
साथ जितना दिया शुकराना था।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"