आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रह-ए-उल्फ़त पे थोड़ी दूर साथ चले

                
                                                         
                            तुम से मिलते थे वो ज़माना था,
                                                                 
                            
ख़्वाब इन आँखों में सजाना था।

बस एक दीदार की हसरत लिये
तुम्हारे कूचे से आना जाना था।

रौनक-ओ-रानाई निखर जाती थी,
दिलकश तुम्हारा मुस्कुराना था।

हुए रुसवा तुम्हारी उल्फ़त में हम,
हर ज़ुबाँ पे हमारा फ़साना था।

रह-ए-उल्फ़त पे थोड़ी दूर साथ चले,
आगे एक मोड़ पर मुड़ जाना था।

"शमीम" कौन साथ देता है ता-उम्र, ,
साथ जितना दिया शुकराना था।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर