तुमसे मिले तो लगा मिले ख़्वाब ही से हम,
देखा किए हुस्न-ओ-जमाल ख़ामुशी से हम।
एक चेहरा जो ख़यालों में हमने सजाया था,
अहसास हुआ हमको; मिले हैं उसी से हम।
तुम से ही सजा है मेरे अरमानों का जहान,
जीते हैं हर लम्हा वक़्त-ए-ख़ुश-दिली से हम।
जब साथ हम होते हैं, दुनिया भूल जाते हैं,
बेफ़िक्र से रहते हैं हर तअना-ज़नी से हम।
हमसे ख़फ़ा न होना गर ख़ता कोई हो तो,
डरते हैं ऐ हमदम तुम्हारी बरहमी से हम।
तुम हमसफ़र हो तो दिलनशीं है रहगुज़र,
मंज़िल को पा लेंगे "शमीम" वाबस्तगी से हम।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"