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परिंदों को नहीं सरहद की बंदिश

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कौन सी राह पर चला जाए,
        
                                                    
                            
कश्मकश है किधर चला जाए।

हर क़दम पर यहाँ दुश्वारियाँ हैं,
बहुत संभल कर चला जाए।

चलते रहना बहुत ज़रूरी है,
जैसी हो रहगुज़र चला जाए।

परिंदों को नहीं सरहद की बंदिश,
जिधर चाहे उधर चला जाए।

इस से बेहतर जगह नहीं कोई,
चलो फिर अपने घर चला जाए।

किसी का दिल न दुखाना "शमीम",
कौन कब छोड़कर चला जाए।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
एक महीने पहले
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