आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

परिंदों को नहीं सरहद की बंदिश

                
                                                         
                            कौन सी राह पर चला जाए,
                                                                 
                            
कश्मकश है किधर चला जाए।

हर क़दम पर यहाँ दुश्वारियाँ हैं,
बहुत संभल कर चला जाए।

चलते रहना बहुत ज़रूरी है,
जैसी हो रहगुज़र चला जाए।

परिंदों को नहीं सरहद की बंदिश,
जिधर चाहे उधर चला जाए।

इस से बेहतर जगह नहीं कोई,
चलो फिर अपने घर चला जाए।

किसी का दिल न दुखाना "शमीम",
कौन कब छोड़कर चला जाए।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर