कौन सी राह पर चला जाए,
कश्मकश है किधर चला जाए।
हर क़दम पर यहाँ दुश्वारियाँ हैं,
बहुत संभल कर चला जाए।
चलते रहना बहुत ज़रूरी है,
जैसी हो रहगुज़र चला जाए।
परिंदों को नहीं सरहद की बंदिश,
जिधर चाहे उधर चला जाए।
इस से बेहतर जगह नहीं कोई,
चलो फिर अपने घर चला जाए।
किसी का दिल न दुखाना "शमीम",
कौन कब छोड़कर चला जाए।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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