तुम आई तो हवा भी ठहर गई,
जूही की खुशबू गहरी हो गई।
तुम्हारी आँखों में काजल नहीं, सावन है,
जिसमें मैं हर बार भीग जाता हूँ,
तुम्हारी हँसी में पायल की छनक है,
जिसे सुन के मैं खुद को भूल जाता हूँ।
तुमने जब बालों को कंधे से हटाया,
शाम ने भी करवट बदली,
तुम्हारी साड़ी का वो हल्का सा कोना,
जैसे चाँद पर घटा फिसली।
तुम्हारे होंठ - जैसे दोपहर में दो पत्ते,
गुलाब से भी ज़्यादा नरम,
तुम्हारा छूना - जैसे पहली बारिश,
मिट्टी को जैसे मिला मरहम।
मत देखो ऐसे, मैं बहक जाऊँगा,
मैं तो वैसे ही तुम्हारा हूँ,
तुम पास हो तो वक़्त भी रुक जाए,
तुम्हारी एक झलक में सारा जहाँ हूँ।