प्रतिफल 2
सच कहा तुमने,
यदि प्रेम का बिल आता
तो कोई भी उसे भर न पाता।
क्योंकि प्रेम में
देना ही पाना है,
और पाने की कोई रसीद नहीं होती।
तुमने मेरे भीतर
जो जगह खाली की,
वो व्यापार नहीं था,
वो प्रार्थना थी —
बिना लौटने की शर्त के
किसी का नाम
अपने भीतर बसा लेना।
और सुनो,
प्रेम को प्रतिफल नहीं चाहिए,
उसे बस इतना चाहिए
कि वो जहाँ है,
वहाँ सच्चा रहे।
तुमने चाहा,
और चाह कर
कुछ माँगा नहीं —
यही तो प्रेम को
सबसे महँगा बनाता है,
यही तो उसे
अमूल्य बनाता है।