विज्ञापन

पहलगाम !

Deepak Tomar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अखबार की स्याही और,
        
                                                    
                            
टेलीविजन की छोटी सी
खिड़की से झांकती दहशत,
धीरे धीरे उस मैदान में पसर गई,
जहां माहौल था बेहद खुशनुमा,
मगर अमान के इंतजामात ना थे !
खिलखिलाहटें चीखों में बदली
और इंसानियत वहशियत में,
और फिर नजर आई दहशत,
सबसे हौलनाक रूप में,
सबसे घृणित, वीभत्स रूप में,
जिसके कोई एक दो नहीं,
अट्ठाइस गवाह थे !
मिट्टी, लहू और घात से सराबोर
उन गवाहों का बस एक सवाल था,
"कौन हारा, मजहब या इंसानियत ?"
-दीपक तोमर
 
एक वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Pandey

419 कविताएं

View Profile