अखबार की स्याही और,
टेलीविजन की छोटी सी
खिड़की से झांकती दहशत,
धीरे धीरे उस मैदान में पसर गई,
जहां माहौल था बेहद खुशनुमा,
मगर अमान के इंतजामात ना थे !
खिलखिलाहटें चीखों में बदली
और इंसानियत वहशियत में,
और फिर नजर आई दहशत,
सबसे हौलनाक रूप में,
सबसे घृणित, वीभत्स रूप में,
जिसके कोई एक दो नहीं,
अट्ठाइस गवाह थे !
मिट्टी, लहू और घात से सराबोर
उन गवाहों का बस एक सवाल था,
"कौन हारा, मजहब या इंसानियत ?"
-दीपक तोमर
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