कंधे से पहले हाथ बढ़ाइए
न जाने क्यों
मरे हुए इंसान को कंधा देना
लोग पुण्य समझते हैं,
मगर ज़िंदा इंसान को सहारा देना—
क्यों बोझ समझते हैं?
मौत के बाद
चार कंधे मिल जाते हैं,
मगर ज़िंदगी में
एक सच्चा कंधा
क्यों नहीं मिलता?
अर्थी पर फूल चढ़ाने वाले
बहुत मिल जाते हैं,
मगर जो इंसान
ज़िंदगी की राह में टूट रहा हो,
उसके आँसू पोंछने वाला
क्यों कोई नहीं मिलता?
शायद हमने
संवेदनाओं को रस्मों में बाँट दिया है,
रिश्तों को मतलब में,
और इंसानियत को
सिर्फ़ शब्दों में।
व्यवस्था को
काग़ज़ पर इंसान चाहिए,
समाज को
मंच पर संवेदना,
और इंसान को
बस तब तक साथ चाहिए
जब तक साथ देना
मुश्किल न हो।
मगर जनाब,
इंसानियत की असली परीक्षा
किसी की आख़िरी यात्रा में नहीं,
किसी की अधूरी ज़िंदगी में होती है।
किसी की अर्थी उठाने से पहले
कभी उसका हौसला उठाइए,
किसी की तस्वीर पर फूल चढ़ाने से पहले
किसी ज़िंदा चेहरे पर मुस्कान लाइए।
क्योंकि—
मृत देह को कंधा देना
एक अंतिम संस्कार है,
मगर ज़िंदा इंसान को सहारा देना
इंसानियत का संस्कार है।
और शायद जिस दिन
हम मौत के बाद कंधा देने से पहले
ज़िंदगी में हाथ बढ़ाना सीख जाएँगे,
उस दिन
समाज को शांति के लिए
किसी बड़ी प्रार्थना की ज़रूरत नहीं होगी—
क्योंकि उस दिन
इंसानियत ही
हमारी सबसे सच्ची प्रार्थना होगी।