"आख़िर मेरा क्या है"
रात जब दुनिया
अपने-अपने ख़्वाबों में सो जाती है,
तब मैं चुपचाप
अपने भीतर जागता हूँ।
दिनभर की भीड़ में
सबके लिए जीते-जीते,
कभी ख़ुद से भी पूछता हूँ—
“आख़िर मेरा क्या है?”
मंज़िलें बहुत हैं,
लोगों की उम्मीदें भी कम नहीं,
ज़िम्मेदारियों का कारवाँ है
जो हर रोज़ आगे बढ़ता है…
मैं चलता हूँ—
कभी मन से,
कभी मजबूरी से,
और कभी सिर्फ़ इसलिए
कि मेरे रुकने से
किसी अपने का हौसला न टूट जाए।
मगर सच कहूँ…
हर मुस्कुराता चेहरा
सुकून में हो,
ज़रूरी तो नहीं।
कभी-कभी
सबको संभालने वाला इंसान भी
अंदर से बिखर रहा होता है,
बस उसके आँसू
दिखाई नहीं देते।
मैंने भी बहुत कुछ चाहा था—
थोड़ा-सा सुकून,
कुछ अपने पल,
कुछ अधूरे ख़्वाब,
और एक ऐसी ज़िंदगी
जिसमें मुझे
हर वक़्त ख़ुद को साबित न करना पड़े।
पर वक़्त ने सिखाया—
ज़िंदगी हमेशा
हमारी पसंद से नहीं चलती,
कभी रिश्ते चुनने पड़ते हैं,
कभी फ़र्ज़,
कभी परिवार…
और कई बार
ख़ुद को सबसे पीछे रखना पड़ता है।
फिर भी एक सवाल
हर रात लौट आता है—
“जिस ज़िंदगी को निभाते-निभाते
तुमने सबको पा लिया,
उस ज़िंदगी में
तुमने ख़ुद को कब पाया?”
शायद अब जवाब
दुनिया से नहीं,
मुझे ख़ुद से देना है।
क्योंकि ज़िंदगी का मतलब
सिर्फ़ साँस लेते रहना नहीं…
कभी अपने भीतर भी लौटना है,
अपने ख़्वाबों को फिर से छूना है,
और ख़ुद से इतना तो कहना है—
“तू भी इस ज़िंदगी का
एक ज़रूरी हिस्सा है…”
आख़िर उम्र बीत जाने के बाद
यह अफ़सोस नहीं होना चाहिए
कि मैंने सबके लिए तो जी लिया…
बस
अपने लिए जीना भूल गया।