विज्ञापन

हुआ मुब्तला-ए-ग़म-ए-यार आख़िर,

DEEPAK PRAJAPATI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हुआ मुब्तला-ए-ग़म-ए-यार आख़िर,
        
                                                    
                            
ये लड़कों का दिल तो गया हार आख़िर।

न मंदिर का माथा, न मस्जिद का सजदा,
हुआ रूह का रोग ख़ूँ-ख़्वार आख़िर।

हकीमों ने नब्ज़ों को छूकर ये देखा,
मरीज़-ए-मोहब्बत है बीमार आख़िर।

न मन्नत का धागा, न कोई दुआ अब,
असर कर गया इश्क़ का वार आख़िर।

न आया सुकूँ 'अश्क' को उम्र भर भी,
उसे खा गया दर्द-ए-दीदार आख़िर।
- दीपक 'अलक'
5 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dr Vikas

7 कविताएं

View Profile