हुआ मुब्तला-ए-ग़म-ए-यार आख़िर,
ये लड़कों का दिल तो गया हार आख़िर।
न मंदिर का माथा, न मस्जिद का सजदा,
हुआ रूह का रोग ख़ूँ-ख़्वार आख़िर।
हकीमों ने नब्ज़ों को छूकर ये देखा,
मरीज़-ए-मोहब्बत है बीमार आख़िर।
न मन्नत का धागा, न कोई दुआ अब,
असर कर गया इश्क़ का वार आख़िर।
न आया सुकूँ 'अश्क' को उम्र भर भी,
उसे खा गया दर्द-ए-दीदार आख़िर।
- दीपक 'अलक'