तुझे देखा था हरी साड़ी में पहली मर्तबा,
न जाने देखते ही देखते कब दिल हार गया था।
वो तुम्हारे माथे पर नन्ही बिंदी,
हाथों में हरी चूड़ियाँ।
स्वेत वर्ण पर मानो ढ़ा रही थी बिजलियाँ।
जो एक बार नज़रें मिली तो
अक्ष तुम्हारा हृदय में छपा रह गया।
तुम सामने दरवाजे से निकली
और मैं वहीं घँटों खड़ा रह गया।
मन के तरंग पर सवार हो,
नवज़ात शिशु के समान
प्रेम की किलकारी से
गूँज रहा था आसमान।
यह कोलाहल आत्मशुन्य में मचा हुआ था।
मैं बेचैनी में तुम्हें, कहीं बाहर खोज़ रहा था।
ठीक उसी कस्तूरी मृग के समान।
अब, कैसे कहूँ की यह सब का सब अधूरा है।
तुम्हें ज्ञात ही नहीं किंतु इश्क़ पूरा का पूरा है।
समझना-समझाना हमें कभी आया ही नहीं,
मन की बातों को कभी किसी से बताया ही नहीं।
बोलने से ज़्यादा लिखने का आदी रहा हूँ।
प्रतीक, बिंब, तुक-ताल के स्थान पर
विश्रृंखलित भावों में हृदय की व्यथा बताता रहा हूँ।
- दीपक कुमार
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