वक्त कैसा भी हो गुजर जाता है ।
जैसे चढ़ा हुआ दरिया उतर जाता है।
हो इजाजत तो तुझे छू कर देखूं मैं ,
सुना है तुझे छू ले तो आदमी तर जाता है ।
जिसे चाहो और न मिले तो क्या होता है,
आदमी जिंदा रहता है मगर मर जाता है ।
तुम आए हो और आंख में आंसू भी नहीं ,
बारिश के मौसम में तो वर्तन भर जाता है ।
इस उम्मीद से रख दी दहलीज पे किसी ने आंखें,
काम खत्म हो जाए तो आदमी घर जाता है ।
घने दरख़्त की तरह है उस शख्स लहजा,
गर्मी हो तो हर कोई साए में ठहर जाता है।
बहुत बड़ा है दिल का दायरा लेकिन,
कभी कभार लोगों से मन भर जाता है।
मैंने तो आंखों में रोके नहीं आंसू क्योंकि,
बेकार हो जाता है पानी जो ठहर जाता है।
जिम्मेदारियां छीन लेती है गांव का बचपन,
कौन अपनी मर्जी से वरना शहर जाता है।
इसलिए हर मौसम में तेरे साथ रहता हूं,
डाली से टूट जाए तो पत्ता बिखर जाता है।
तुमने छोड़ा है मुझे कोई दुख नही है ,
उड़ जाते है परिंदें जैसे ही पर आता है ।
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