आधा जीवन बीत चुका है, हाथ लगा है मात्र ये धन।
समय गंवाया, शरीर खोया, जलता ही रहता है मन।।
असंतोष की आग है दिल में, ईर्ष्या की है तेज़ तपन।
हवस की भट्टी में झोंक दिया, हमने अपना सुंदर जीवन।।
'पहल कौन पहले कर देगा', इस उलझन में उलझे रहे।
कदम बढ़े न अपनों की जानिब, दूर हुआ हर एक स्वजन।।
न तो बची पहचान कोई अब, न ही रही वो पावन भावना।
भीड़ भरी इस दुनिया में भी, सूना-सूना है आँगन।।
एक ही शहर में रहकर देखो, अजनबी जैसे घूम रहे।
अपनो से मिलने को तरसे, बरस रहे है आज नयन।।
दौड़ रहे थे जिस साए के पीछे, वो तो बस एक धोखा था।
दौलत की इस अंधी चकाचौंध में, भूल गए हम अपनापन।।
वक्त का पंछी उड़ता जाए, हाथ मले हम बैठे हैं।
बीते दिनों की यादें लेकर, रोता है अब अंतर्मन।।
अब तो जाग 'चंद्रिका' तू भी, छोड़ दे ये दुनियादारी।
ढलने लगी है सांझ उम्र की, कर ले थोड़ा प्रभु सिमरन।।
- चंद्रलता यादव 'अरुण'