आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ढलने लगी है सांझ उम्र की, कर ले थोड़ा प्रभु सिमरन।।

                
                                                         
                            आधा जीवन बीत चुका है, हाथ लगा है मात्र ये धन।
                                                                 
                            
समय गंवाया, शरीर खोया, जलता ही रहता है मन।।

असंतोष की आग है दिल में, ईर्ष्या की है तेज़ तपन।
हवस की भट्टी में झोंक दिया, हमने अपना सुंदर जीवन।।

'पहल कौन पहले कर देगा', इस उलझन में उलझे रहे।
कदम बढ़े न अपनों की जानिब, दूर हुआ हर एक स्वजन।।

न तो बची पहचान कोई अब, न ही रही वो पावन भावना।
भीड़ भरी इस दुनिया में भी, सूना-सूना है आँगन।।

एक ही शहर में रहकर देखो, अजनबी जैसे घूम रहे।
अपनो से मिलने को तरसे, बरस रहे है आज नयन।।

दौड़ रहे थे जिस साए के पीछे, वो तो बस एक धोखा था।
दौलत की इस अंधी चकाचौंध में, भूल गए हम अपनापन।।

वक्त का पंछी उड़ता जाए, हाथ मले हम बैठे हैं।
बीते दिनों की यादें लेकर, रोता है अब अंतर्मन।।

अब तो जाग 'चंद्रिका' तू भी, छोड़ दे ये दुनियादारी।
ढलने लगी है सांझ उम्र की, कर ले थोड़ा प्रभु सिमरन।।

- चंद्रलता यादव 'अरुण'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर