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वक्त आया सहारे का तो पानीं के लिए भी तरश जाता है।।

Chandra Makanday

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हाड़ मांस का वह पुतला जो चक्करघिन्नी बन जाता,
        
                                                    
                            
अपने सपनों को छोड़ बच्चों के सपनों में घुल जाता।
बुढ़ापे की लाठी समझ जो जिनकी परवरिश करता है,
वक्त आया सहारे का तो पानीं के लिए भी तरश जाता है।।

 
2 घंटे पहले
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