हाड़ मांस का वह पुतला जो चक्करघिन्नी बन जाता,
अपने सपनों को छोड़ बच्चों के सपनों में घुल जाता।
बुढ़ापे की लाठी समझ जो जिनकी परवरिश करता है,
वक्त आया सहारे का तो पानीं के लिए भी तरश जाता है।।
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